बुधवार, 6 अगस्त 2014

छपी हुई सामग्रीको शोधनीय (टेक्स्ट ) रूपमें लाना

लाना छपी हुई सामग्रीको शोधनीय (टेक्स्ट ) रूपमें --
(ताकि सारे सर्च इंजिन्स उस सामग्रीमें आवश्यकतानुसार खोज कर सकें -- यह हमारे भाषाई साहित्यके भविष्यकालीन रखरखावके लिये संजीवनी की तरह है।)

सामग्री का स्क्रीन शॉट ले लें।
फिर किसी इमेज व्यूअर (इरफ़ानव्यू) में जाकर
इमेज को क्लिपबोर्ड से पेस्ट करें।
आवश्यक क्षेत्र को माउस से सिलेक्ट कर, यांक कर लें, जिससे बाहर का अनावश्यक क्षेत्र हट जाए
फिर उस इमेज को डिस्क पर सेव कर लें
फिर टेसेरेक्ट ओसीआर चलाएँ, (अन्य भी अच्छे ओसीआर मिल सकते हैं)
उसमें दाहिनी तरफ़ ऊपर के खाने में hin लिखें जिससे हिन्दी की टेबल पर काम चले।
(यह मूल टेसेरेक्ट में नहीं आता है, उनके ज्ञानस्थलसे हिन्दी टेबल डाउनलोड करके इन्स्टॉल करना पडता है।)
डिस्क पर सेव की गई इमेज को ओसीआर में ड्रॅग ड्रॉप कर दें या ओपन कर लें।
क्योंकि यह कॉलम फ़ॉर्मेट में होता है, इसलिए एक साथ पूरी इमेज को करने पर विभिन्न कॉलमों की सामग्री एक ही लाइन में आ कर गड्ड मड्ड हो जाएगी।

इसलिए माउस से एक एक करके एक कॉलम को सिलेक्ट कर लें, जिससे चयनित क्षेत्र के चारों ओर एक चौखटा बन जाएगा।

टूल बार में ओसीआर पर क्लिक करें।
कुछ देर में सामग्री टेक्स्ट फ़ॉर्म में दाहिनी ओर आ जाएगी।
उस सामग्री को सिलेक्ट करके, कॉपी करके किसी वर्ड फ़ाइल में सेव कर लें.
फिर अगले, अगले, अगले कॉलम को इसी तरह से ओसीआर करके उस वर्ड फ़ाइल में ले आयें।
फिर यह विधी समझानेके लिये V S Rawat का धन्यवाद भी करें।

रविवार, 13 जुलाई 2014

सिविल सेवा से ग्रामीण भारत का पत्ता साफ

सिविल सेवा से ग्रामीण भारत का पत्ता साफ!

सिविल सेवा की प्राथमिक परीक्षा में दो प्रश्नपत्र होते हैं। पहला प्रश्नपत्र सामान्य ज्ञान का होता है, जिसमें सौ प्रश्न होते हैं, प्रत्येक के लिए दो अंक होते हैं। द्वितीय प्रश्नपत्र में अस्सी प्रश्न होते हैं, जो कि एप्टिट्यूट की जांच करता है, जिसमें किसी मुद्दे से जुड़े गद्यांश होते हैं और उस पर आधारित प्रश्न होते हैं। सामान्य गणित, तर्कशक्ति आदि से भी संबंधित प्रश्न होते हैं। इस प्रश्नपत्र में प्रत्येक के लिए ढाई अंक निर्धारित होते हैं। कुछ कोचिंग संस्थान यह दावा करते हैं कि सामान्य अध्ययन में कितने भी कम नंबर क्यों न हों, अगर आप द्वितीय प्रश्नपत्र में हमारे यहां कोचिंग करते हैं तो आपका प्राथमिक परीक्षा में उत्तीर्ण होना तय है।
इससे यह बात स्पष्ट है कि द्वितीय प्रश्नपत्र किसकी सहायता कर रहा है। सबको अच्छी तरह पता होता है कि मानविकी के परीक्षार्थियों की गणित में कैसी गति होगी और जब इसको अचानक थोप दिया जाए तो स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। मानविकी का कोई छात्र अगर ऐसे विषय में परिश्रम से कुछ सीख भी जाता है तो क्या आइआइएम या आइआइटी या बैकिंग वालों की बराबरी कर सकता है? अगर गैर-मानविकी के छात्र ने सामान्य अध्ययन में तैंतीस प्रतिशत से कम भी किया है और एप्टिट्यूट के प्रश्न में अच्छा कर लिया तो उसकी प्राथमिक परीक्षा में चयनित होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। गद्यांश के संबंध में यह देखने में आया है कि हिंदी में उसका रूपांतरण समझ के परे होता है। कुछ अंगरेजी शब्दावलियों का प्रचलित हिंदी अनुवाद न लिख कर कुछ और लिख दिया जाता है, जिससे परीक्षार्थी के पल्ले कुछ नहीं पड़ता। कभी-कभी गद्यांशों में ही किसी अंगरेजी शब्द का अनुवाद एक जगह कुछ और दूसरी जगह कुछ और होता है, जिससे हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों का अधिक समय वास्तविक अर्थ समझने में जाया हो जाता है।
उदाहरण के लिए, किसी वर्ष अंगरेजी के रियलिज्म का अनुवाद वास्तविकतावाद लिखा जाता है, जबकि इसके लिए प्रचलित हिंदी शब्द यथार्थवाद है। पॉजिटिविज्म को एक वर्ष प्रत्यक्षवाद लिखा रहता है तो दूसरे वर्ष सकारात्मकतावाद, जबकि दोनों में बहुत अंतर है। ऐसी स्थिति में गद्यांश का भाव समझने में ही परीक्षार्थी का काफी समय चला जाता है और उसके प्रश्नपत्र का बहुत ज्यादा हिस्सा छूट जाता है। इस तरह संघ लोक सेवा आयोग की नई परीक्षा पद्धति ने कई समस्याएं पैदा की हैं, जिनमें से मुख्य हैं-दोनों प्रश्नपत्रों के प्रश्नों के अंकों में असमानता; किसी भी प्रश्नपत्र में क्वालीफाइंग का न होना; गद्यांश को हिंदी में प्रस्तुत न कर, उसका अनुवाद दिया जाना, वह भी ऐसा, जो गद्यांश के भाव को ही बदल देता है; प्रचलित हिंदी शब्दों के स्थान पर अंगरेजी शब्दावली का अनभिज्ञ अनुवादकों द्वारा अपने अनुसार प्रयोग। इन सभी बिंदुओं पर विचार करने के बाद जो समाधान निकल कर सामने आता है, वह यह है कि दोनों प्रश्नपत्रों का मूल्य (वेटेज) बराबर किया जाए और दोनों प्रश्नपत्रों में क्वालीफाइंग कसौटी निर्धारित की जाए, ताकि यह एकांगी होने से बच सके। 
गद्यांशों के अनूदित रूप देने के बदले उनके सिर्फ भाव का अनुवाद किया जाए। हिंदी की प्रचलित शब्दावली का प्रयोग किया जाए। अन्य भारतीय भाषाओं के मामले में भी ऐसा ही हो। मुख्य परीक्षा के लिए ऐसी प्रणाली अपनाई जाए, जिससे मानविकी-विषयों और हिंदी समेत प्रांतीय भाषाओं के अभ्यर्थियों को नुकसान न उठाना पड़े। कुछ वैकल्पिक भाषाओं को मुख्य परीक्षा से बाहर कर दिया गया है, उन्हें पुन: विचार करके समाहित किया जाए। अंगरेजी, हिंदी और अन्य माध्यम से चयनित होने वाले छात्रों के अनुपात में संतुलन बनाने की कोशिश की जाए।
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English Vinglish, the movie, was released in 2012 and received wide acclaim across the globe. It has been in news again. The movie tells the tale of a housewife, the protagonist, who fights a valiant personal battle in overcoming her English language handicap. Tales of personal ambition, resolve and perseverance to overcome debilitating circumstances that one is placed in are always a source of inspiration. Indeed the character of Shashi that Sri Devi plays in the movie deserves our standing ovation for her fortitude.
Discontent of civil services aspirants However in the narrative, inside the movie and later on in critiques by movie pundits and among friends in drawing room discussions, role of the frame that conflates non-exposure to a language and general ineptitude has not been explored.The story actually hides a sordid reality of our times in celebratory din of individual’s triumph within a frame. In our vicarious jubilation over the protagonist’s victory, we fail to pause and ask: Is this the only way in which the hurdle can be overcome? Should the frame exist in its current form? Let me share a little observation: For a Polish or Hungarian or Turkish woman, Shashi’s predicament doesn’t translate into a matter of personal ignominy.
The prime motivation behind this article is not a review of the movie but the movie does come in handy in pointing to the mindset that is prospecting the rigged frame with all its might. For some time now, a section of civil services aspirants — those who primarily hail from rural areasand generallydo not have adequate exposure to English language — have been staging protests against Union Public Services Commission’s adopted selection process. Initially, the mainstream media managed to project the discontent as English vs Hindi issue. Now, when the issue of English questions has been addressed by the Government and the protests have still not been called off – a sincere follower of the issue is prompted to scratch the surface deeper.
The memorandum submitted originally in Hindi on behalf of ‘candidates of Indian languages and rural background’ places the following demands:
1. Scrapping of Civil Services Aptitude Test paper II (CSAT-II) in the prelims because it places candidates with Hindi and other Indian languages medium, and candidates with Arts and Humanities educational background at disadvantage;
2. Rationalisation of the difficulty level of the English qualifying paper in the Mains by aligning its difficulty level with difficulty level of Hindi and other Indian languages;
3. Ensuring that model answer books of Mains exam question papers are available in all Indian languages. Further ensuring that the answer books are marked by examiners of the respective Indian language in which answers have been attempted and ensuring that marking across languages is calibrated.
4. Ensuring that the translation of Prelims and Mains question papers into Hindi is not done by machines. Translated question papers should be readily comprehensible.
5. Interview board should have clear instructions to not to force candidates from Indian languages to speak in English during the interview.
The sixth demand is not relevant to this article and thus I have not mentioned it here. Each one of the demand is further supported with data, analysis, references, interpretation and conclusions. I will like to pause this discussion a little and applaud the protesters for the analytical flair, issue structuring, and directional conviction that they have been able to demonstrate through the memorandum. The memorandum is not a work of destructive hooligans (as has been painted by some English media columnists) who know nothing better than arson on the streets. It is a work of cooperation for mutual interest and is as resourceful as any such document from anywhere in the world could be. Is anyone listening?
Frame boundaries
Of course UPSC should use her ingenuity in finding the most apt candidates. I agree that the aptitude discovery processes should be decided by her autonomously. But UPSC is answerable to the people of the country and it cannot be operating without any accountability. It has to work within an accountability frame and I would like to set some frame boundaries that an organ of our constitution in a position such as UPSC must respect.
1. Language neutral: Aptitude doesn’t belong to any one single language. India is a multilingual country and any selection process must neither favor any one foreign or Indian language nor disfavor any language.
2. Discipline neutral: Civil services have been conceptualized as generalist services and that is also accentuated by the wide selection of subjects available as exam options in the Mains. That being the guiding principle the selection process must not favour or disfavor any discipline.
3. Resource neutral: India is a highly heterogeneous country in terms of resource endowments. Competition can only be fair if all children of the country had an equal chance of cultivating their 1. intelligence into what would qualify as ‘aptitude’ for civil services. This boundary condition would seek to balance pre-selection aptitude testing and post‑selection aptitude cultivation.
4. Examiner neutral: Examiners bring their own personal biases into the process at the time of marking answer books and paper-setting. This boundary condition demands that personal biases of examiners should not come into play.
Demand number 1 – CSAT must be scrapped, arises from violation of first three boundary conditions. One, it is conducted only in Hindi and English and leaves other Indian languages out; and two, it sources its questions from resource material that has generally not been made available in Indian languages. In a previous article, I had proposed an amendment to the Multidimensional Poverty Index and asserted that availability of linguistic infrastructure in the language of a person’s education is essential for poverty eradication. Therefore till the time such linguistic infrastructure is erected in Indian languages it is unfair to source questions from English infrastructure and serve their nonsensical translations.
Demands 2, 3, 4 and 5arise from violation of language neutrality boundary. In some ways they also point towards violation of Resource neutrality boundary condition.Demand 3 – ensuring model answer books are available in all languages, also arises because of violations of Examiner neutrality. Demand 5 – instructions to interviewers to not to force Indian Languages candidates to respond in English, arises from a contemptuous attitude towards candidates of Indian Languages that often hangs in the interview room. The process actually violates more than just the boundaries I have proposed. It violates an Indian’s Right to Non-discrimination and life of self-dignity.
In the frame that I have proposed Demand 2 should actually be changed with dropping the English paper altogether for those candidates who opt for Indian languages.The big question that I see coming my way in reaction to this proposal is:How will this motley linguistic harvest of future civil servants effectively work together? Indeed such a change will have to be supported with linguistic infrastructure and linguistic services which are currently absent in our country. Length of the post selection training program can be increased, training in link language(s) can be imparted and candidates can then be re-examined.
Sridevi’s message to IAS aspirants

A section of our society (yes English obsession binds us across the border too!) interprets demands of these aspirants as their reluctance to face competition and rise up to the challenge. The following tweet caught my attention:






























बुधवार, 7 मई 2014

भाषा नीति कैसी हो

चेत जाइये वरना युनीकोड बनेगा हमारी एकात्मिक सांस्कृतिक धरोहर को खतरा

चुनावी उम्मीदवारोंमेंसे एक भी पसंद न हो तो आपको अनास्था जतानेका अधिकार अब उच्चतम न्यायालय के कारण मिल 

पाया । लेकिन लडाइयाँ कितनी बाकी हैं। अनास्था मत का चुनाव चिह्न होगा NOTA. यह भारतीय भाषाओंका और भारतीय 

संविधान का सरासर अपमान है कि हम अपनी बात कहने के लिये अपनी भाषा के शब्द नही अपनाते। उसके प्रति सजग नही 

रहते।
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इस देवभूमि भारतकी करीब पचास भाषाएँ जिनकी प्रत्येककी लोकसंख्या 10 लाखसे कहीं अधिक है, और करीब 7000 बोलीभाषाएँ जिनमेंसे प्रत्येकको बोलनेवाले कमसे कम पाँचसौ लोग हैं, ये सारी भाषाएँ मिलकर हमारी अनेकता में एकता का अनूठा और अद्भुत चित्र प्रस्तुत करती है। इन सबकी वर्णमाला एक ही है, व्याकरण एक ही है और सबके पीछे सांस्कृतिक धरोहर भी एक ही है। यदि गंगोत्रीसे काँवड भरकर रामेश्वर ले जानेकी घटना किसी आसामी लोककथा को जन्म देती है, तो वही घटना उतनीही क्षमतासे एक भिन्न परिवेशकी मलयाली कथा को भी जन्म देती है। इनमेसे हरेकने अपने शबदभंडारसे और अपनी भाव अभिव्यक्तिसे किसी न किसी अन्य भाषाको भी समृद्ध किया है। इसी कारण हमारी भाषासंबंधी नीतिमें इस अनेकता और एकता को एकसाथ टिकाने और उससे लाभान्वित होनेकी सोच हो यह सर्वोपरि है -- वही सोच हमारी पथदर्शी प्रेरणा होनी चाहिये।

 1. सुधारोंका प्रारंभ हो -- सर्वोच्च न्यायालय, गृह व वित्त मंत्रालय, केंद्रीय लोकराज्यसंघकी परीक्षाएँ, एंजिनियरिंग, मेडिकल तथा विज्ञान एवं समाजशास्त्रीय विषयोंकी स्नातकस्तरीय पढाई ।सुधारोंका दूसरा छोर हो प्रथमिक और माध्यमिक स्तरकी पढाई।
2. अनेकतामें एकताको बनाये रखनेके लिये दो अच्छे साधन हैं - संगणक एवं संस्कृत। उनके उपयोग हेतु विस्तृत चर्चा हो।
3. हमारी भाषाई अनेकतामें एकताका विश्वपटलपर लाभ लेने हेतु ऐसा चित्र संवर्द्धित करना होगा जिसमें सारी भाषाओंकी एकजुट स्पष्ट हो। आजका चित्र तो यह है कि हर भाषा की हिंदी के साथ और हिंदीकी अन्य सभी भाषाओंके साथ प्रतिस्पर्धा है। इसे बदलना हो तो पहले आवश्यक है कि जनगणना में यह पूछा जाय कि आपके कितनी भारतीय भाषाएँ आती हैं, ना कि केवल आपकी मातृभाषा कौनसी है।विश्वपटलपर जहाँ लोकसंख्या गिनतिका लाभ उठाया जाता है -- वहाँ वहाँ हिंदीको पीछे खींचनेकी चाल चली जा रही है। क्योंकि संख्याबलमें हिंदी के टक्करमें केवल अंग्रेजी और मंडारिन (चीनी) है- बाकि तो कोसों पीछे हैं। यदि मेरी मातृभाषा मराठी है और मुझे हिंदी व मराठी दोनों ही प्रिय हों तो मेरा मराठी-मातृभाषिक होना हिंदीके संख्याबल को कम करें यह मैं कैसे सहन कर सकती हूँ--और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना लाभ क्यों गवाऊँ? क्या केवल इसलिये कि मेरी सरकार मुझे अंतर्राष्ट्रीय स्तरपर हिंदीकी महत्ताका लाभ नही उठाने देती ? अतएव सर्वप्रथम हमारी अपनी राष्ट्रनीति सुधारे और मेरे भाषाज्ञानका लाभ मेरी दोनों माताओंको मिले ऐसी कार्य-प्रणाली भी बनायें यह अत्यावश्यक है।
औऱ बात केवल हिंदीकी नही है। विश्वस्तरपर जहाँ मराठी, मैथिली, कन्नड या बंगाली लोक-संस्कृतीकी महत्ता उस उस भाषाको बोलनेवालोंके संख्याबल के आधारपर निश्चित की जाती है, वहाँ वहाँ मेरी उस भाषाकी प्रवीणताका लाभ अवश्य मिले- तभी मेरे भाषाज्ञानकी सार्थकता होगी। तो क्यों न हमारी राष्ट्रभाषानीति ऐसी हो जिसमें मेरे भाषाज्ञानका अंतर्राष्ट्रीय लाभ उन सारी भाषाओंको मिले। यदि ऐसा हो, तो मेरी भी भारतीय भाषाएँ सीखनेकी प्रेरणा अधिक दृढ होगी।
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शनिवार, 19 अप्रैल 2014

क्षेत्रपाल शर्मा के लिये

संगणकपर देवनागरी क्यों और कैसे लिखें --
यदि आप दिलसे हिंदीके लिये समर्पित हैं लेकिन तकनीकि कठिनाइयोंकी जानकारी नही रखते तो सरलतासे कठिनाइयोपर विजय पाने हेतु इसे पढें और उपयोग में लायें --
यदि आप सरकारी उच्चाधिकारी हैं तो आपकी सर्वप्रथम दुविधा है कि आपके विभागकी वेबसाइट अर्थात् जानकारी-स्थल हिंदीमें समुचित रुपसे कारगर नही है।
क्या आप दिलसे इसका उपाय करना चाहते हैं -- तो इसकी युक्ति है इनस्क्रिप्ट






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२. संविधान की धारा ----------------  में राजभाषा के रूप में हिन्दी को प्रस्थापित करने के लिये पंद्रह वर्षका समय नियत किया गया और जनता, लोकसभा सदस्य तथा सरकार, सभी को यह जिम्मा दिया गया कि उसके लिये सफल प्रयास करें। राजभाषा हिंदी के साथ-साथ सभी भारतीय लिपियाँ व भाषाओंके लिये भी प्रायः ऐसा ही निर्देश दिया गया।




























बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

भाषा-व्याकरण, ज्ञान भावोत्पत्ति -- रेडियो मधुबन

Bhasha Vyakaran

भाषा-व्याकरण, ज्ञान भावोत्पत्ति -- रेडियो मधुबन

































एक अलग लेख
भाषा है क्या क्या?
भाषा क्या है? हम क्यों बोलते हैं? - सीधी सी बात है। हम अपने बात को दूसरे तक पहुँचाने के लिए बोलते हैं। जो हम बोलते हैं उसे भाषा कहते हैं। 
लेकिन रुको। क्या तुमने कभी किसी पेड पर चढने का आनन्द लिया है? या फिर कभी खिडकी की सरिया पकडकर खिडकी की मुंडेर पर चढा हैं? कोई ऐसा काम किया है जो अँडव्हेंचर मे आता है?कोई भी ऐसा काम जो करने पर दोस्त-माता पिता-चाहने वाले सबकी आँखो मे प्रशंसा का भाव भर जाता हैं? ऐसा कोई अँडव्हेचर करनेपर मन नही मानता। मन उकसाता हैं- चलो अब एक अँडव्हेचर और करो।
तो एक बार मेरे साथ भी यही हुवा। मैं लिख बैठी कि भाषा जो है, सो अपनी बात को दूसरे तक पहुँचाने का माध्यम है। तो मनने टोक कर पूछा- बस इतना ही? फिर मुझे चिढाते हुए कहा - सोचो, सोचो, भाषा और भी बहुत कुछ है। फिर मैने सोचा तो लगा- सचमुच भाषा केवल संवाद का माध्यम नही हैं। भाषा सामर्थ्य है- सौंदर्य है और एक लयबध्द नियमबध्द व्यवस्था भी है। इन तीनोंके कारण शक्ती भी हैं। और संस्कृति का परिचय तो हमारी भाषा से ही होता है।
भाषा में सामर्थ्य है -- हमे प्रोत्साहित करने का, हमे दुखी करने का, हमे खुश करने का। जब हमारे ऋषि कहते हैं- उत्तिष्ठत जाग्रत, प्राय वरान्निबोधित -- अर्थात उठो जागो और उसे जानो जो सबसे अच्छा है और उसे पाने का प्रयास करो -- तो हमे प्रेरणा मिलती है। जब माँ पिता कहते है कि, तुमने हमारा सर ऊँचा कर दिया हैं, तब मन में एक आत्मविश्वास भर जाता हैं। कोई डाँट दे कि क्या गलती कर रहे हो, तो वाकई हम सोचने लगते हैं कि क्या और क्यों गलती कर डाली। इस प्रकार भाषा में सामर्थ्य हैं- भाव उत्पन्न करने का।
भाषा में सौदर्य भी है। जैसे जब हम पहली बार सुनते हैं- "चाचाने चाचीको चान्दीके चम्मच से चटनी चटाई" तो मन अनायास इस भाषा लालित्य पर मुग्ध हो जाता है। या यह पंक्ति हो- "तरनी तनुजा तट तमाल तरुवर बहू छाये"। या फिर यह पंक्तियाँ देखो-
पयसा कमलं कमलेन पयः
पयसा कमलेन विभाति सरः।
मणिना वलयं, वलयेन मणिः
मणिना वलयेन विभाति करः।।
इस प्रकार भाषा एक सौदर्य, लालित्य और माधुर्य का भाव भी जगाती है।
भाषा में जो एक नियमबद्धता और व्यवस्था होती है उसका भी अपना महत्व है। यह नियमबद्धता दो तरह से प्रकट होती है। पद्य रचना हो तो उसे छंद, ताल, लय का ध्यान रखना पडता हैं। गद्य रचना हो तो हर वाक्य की रचना का ध्यान रखना पडता हैं। इसीको व्याकरण कहते हैं।
भाषा से संस्कृती भी झलकती है। गंगा मैया कहने से झलकता है कि हमारी संस्कृती मे नदी को माँ जैसा सम्मान दिया जाता है। जब हम कहते हैं अतिथि देवो भव तो इससे हमारी अतिथिको सम्मान देने की परंपरा झलकती है। जब हम सुनते है - "रखिया बंधा ले भैया सावन आइल" तो हमारी भारतीय संस्कृती मे भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को बात समझ में आती है।
और भाषा सें ज्ञान का प्रवाह होता है इस बातको कौन नही जानता? मनुष्य ने भाषा बोलना सीखा इसी लिये अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य कहीं से कहीं पहुँच गया। हम भी अपनी भाषा का सम्मान करें क्योंकि, उसी को आधार बनाकर हम ऊँचाईयोंको छू सकते हैं।
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शनिवार, 20 जुलाई 2013

किती व्याकरण शिकाल ?

किती व्याकरण शिकाल ?
 (३९)
भाषा  शिकवनांना व्याकरण किती शिकवावे या बाबत दोन टोकाच्या भूमिका बरेचदा घेतल्या जातात.. त्याच्या शिवायही भाषा बोलता येते - सहित्याचा रसास्वाद घेता येतोय  मग कशाला हवेत ते नाम सर्वनामाचे धडे, किंवा उपसर्ग प्रत्ययाचा त्रास - झाल्या थोड्या शुद्धलेखनाच्या चुका म्हणून कांय बिघडले !

दुसऱ्या बाजूचे लोक सध्या अल्पमतात आहेत ! त्यांच्या मते विद्यार्थ्याला व्याकरण आलेच पाहिचे.  व्याकरणाशिवाय भाषा शिकणे म्हणजे  दृष्टिवाचून रंगांचे वर्णन वाचण्या सारखे ! अशा तहेने (व्याकरण न शिकता) तुम्ही भाषा शिकूच शकत नाही !

पण मी मात्र या प्रश्नाकडे तिसऱ्याच बाजूने पहाते !  आपले व्याकरण शिकल्याने आपल्याला परभाषा चटकन शिकता येते ही ती बाजू ।

विशेषतः   आपल्याला इतर  भारतीय भाषा शिकायच्या असल्या तर व्याकरणाचा मोठा फायदा  असा कि या सर्वांचे व्याकरण बरेचसे सारखे  आहे ।  या  वेगवेगळया भांषाची तुलना संस्कृत व इंग्रजी व्याकरणाबरोबर करून आपल्याला व्याकरणाचा अभ्यास खूप सोपा करता येतो.  व्याकरणातील महत्वाच्या विषयांची एक यादीच मी करून ठेवली व तेवढे शिकून घेतले कि आपले नण्वद टक्के तरी काम भागते. इथे इंग्रजीबदल एकच लक्षांन ठेवायचे. इंग्रजीची वाक्य रचना जरी मराठी वाक्यरचने पेक्षा वेगळी असली तरी व्याकरणाचे नियम पुष्कळसे सारखे आहेत.

गाणं शिकतांना किंवा कविता पाठ करतांना तालाच किंवा ठेक्याच जे महत्व आहे तेच महत्व व्याकरणाला आहे कारण व्याकरणामुळे भाषा सूत्रबद्ध होते.  भाषेचा एक आराखडा तयार होतो - भाषा विस्कळीत  होत नाही.  गाण्याची  गोडी संपूर्ण पणे कांही तालावर अवलंबून नसते  पण कांही गाणी त्यातील  ठेक्यामुळेच गोड वाटतात. भाषेचेही तसेच आहे.  आपल्याला पुढे मागे इतर भारतीय भाषा  शिकण्यासाठी किती व्याकरण आल पाहिजे ?  त्याची यादी अगदी छोटीशी आहे.

पहिला महत्वाचा धड़ा म्हणजे वाक्यातील 'कर्ता' कोण ?  व्याकरणातील किती तरी प्रश्नाची उत्तर शोधतांना कर्ता  कोण हे समजल्यावर उत्तर पटकन शोधता येतं.

त्या खालोखाल महत्व आहे ते शब्दांच्या प्रकाराला - अगदी संस्कृत पासून मराठी पर्यत व इंग्रजीत सुद्धा शब्दांचे आठ प्रकार  पाडलेले आहेत -- नाम, सर्वनाम, विशेषण, क्रियापद, क्रिया विशेषण, केवलप्रयोगी अव्यय, उभयान्वभी अव्यय व उद्गारवाचक किंवा विस्मयादिबोधक शब्द ।

यापैकी नाम कशाला म्हणतात, त्याचे पाच पाडलेले आहेत व कर्ता हा बहुधा नाम व कांही वेळा सर्वनाम या प्रकारांतच मोडतो, तसेच क्रियापद म्हणजे झालेले काम दाखवणारा शब्द इथपर्यंत आपल्याला अगदी सुरुवातीलाच शिकवलेले असते. यापैकी क्रियापदाची रुप सारखी बदलत असतात व परभाषा शिकू पहाणा-यांना त्याचाच जास्त त्रास होतो. कर्ता जसा असेल व काळ जसा बदलेल त्या प्रमाणे क्रियापदाचे स्वरुप बदलते. म्हणून कर्त्याबाबत तीन गोष्टी आपल्याला शिकाव्या लागतात - वचन, लिंग व पुरुष तसेच काळ कोणता आहे ते ही पहावे लागते – वर्तमान, भूत किंवा भविष्य.

'मुलगी जाते' व 'मुली जातात' या दोन वाक्यातून आपल्याला लक्षात येईल कि एकवचनी शब्द मुलगी आणि  बहुवचनी शब्द मुली या दोघांसाठी जाणे या क्रियापदाची दोन रुपे वापरावी लागली ! हा नियम बहुतेक सर्व भाषांमधे आहे. संस्कृत मधे तर द्विवचनासाठी सुद्धा क्रियापदाचे वेगळे रूप वापरावे लागते.

लिंगाप्रमाणे क्रियापदाचे रुप बदलावे लागते ते मराठीत - मुलगी जाते अस आपण म्हणतो. मूळ संस्कृत भाषेत हा फरक नाही. तरीही मराठी, हिंदी, पंजाबी, गुजराती भाषांमधून क्रियापदाचे रुप लिंगाप्रमाणे बदलते. बंगालीत मात्र बदलत नाही इंग्रजीतही बदलत नाही. मात्र हिंदीत दोनच लिंग वापरतात.

मी (किंवा आम्ही), तू (किंवा तुम्ही) आणि
इतर सर्व असे तीन प्रकारचे कर्ते असू शकतात. यांना प्रथम पुरुष, द्वितीय पुरुष व तृतीय पुरूष म्हणतात. यांच्यामुळे देखील  क्रियापदाचे रूप बदलते. यासाठीच संस्कृत मधे धातुरुपे पाठ करावी लागतात - तीन प्रकारची वचने व प्रत्येकी तीन पुरूष अशी नऊ धातुरूपे प्रत्येक क्रियापदासाठी पाठ करुन ठेवली कि झाले. इंग्रजीत सुद्धा वचनाप्रमाणे रूप बदलते पण थोड्याच क्रियापदांचे. To Be हे सर्वांत महत्वाचे क्रियापद सोडले तर इतर क्रियापंदाचे रुप फार बदलत नाही.

कर्त्याशी संबंधित या तीन कारणांशिवाय आणखीन तीन कारणांनी क्रियापदाचे रुप बदलावे लागते. पैकी पहिले कारण काळ घडणारी क्रिया वर्तमानकाळात झाली कि भूतकाळात कि भविष्यकाळात होणार? आणि त्या त्या काळांत पुनः लिंग, वचन व पुरुष माप्रमाणे भेद आहेतच. पण एकदा यांची युक्ति कळली कि प्रत्येक क्रियापदाचे रुप वेगळे पाठ करत बसावे लागत नाही.

दुसरे कारण म्हणजे वाक्य आज्ञार्थ असेल किंवा भावे प्रयोगी असेल किंवा अपूर्ण रुप दाखवात असेल तर क्रियापदाचे रुप बदलते. या शिवाय जर कर्मणी प्रयोग असेल तरी क्रिया पदाचे रुप बदलते. हे सर्व बदल संस्कृत, इंग्रजी मराठी, हिन्दी - या सर्व भाषांमधे आहेत. गंमत अशी कि एका भाषेत क्रियापदाचे रूप कोणत्या प्रकारे ठरले आहे हे कळले कि इतर भाषेमधे सुद्धा त्याचप्रमाणे ठरणार हे उघड आहे. शिवाय ज्यांना शाळेतच तीन-चार भाषा शिकाव्या लागतात त्यांना हाच नियम सर्व पेपरांना पुरतो व व्याकरणात हमखास पैकीच्या पैकी मार्क मिळू शकतात.

यानंतर माइया यादीत महत्व आहे ते केवलप्रयोगी अव्ययाला (म्हणजे इंग्रजीतले preposition) काम करणाऱ्याने नेमके  काय  व कुठले काम केले ?  थोडक्यांत वाक्यातील नामाचा आणि क्रियापदाचा, किंवा एका नामाचा आणि दुसऱ्या नामाचा संबंध आपल्याला या शब्दांमुळे कळतो. राम, घर, आणि गेला हे तीनच शब्द. पण राम घराकडे गेला आणि राम घरातून गेला या दोन वाक्यांचा अर्थ फार वेगळा आहे. बकरीने खाल्ले कि बकरीला खाल्ले ? हा उलगडा बकरी बरोबर लागलेल्या अव्ययामुळेच होतो. इंग्रजीत एकूण पंचवीस तीस  preposition आहेत. ती मालगाडीच्या डव्यांसारखी एकापाठोपाठ एक लिहून काढून पाठच करुन टाकायची pre चा अर्थ आधी व position चा अर्थ जागा. तर ज्याची जागा नामाच्या आधी येते ते preposition. मात्र हे झालं इंग्रजीत. संस्कृत आणि त्यातून निघालेल्या सर्व भाषांमधे हे केवलप्रयोगी अव्यय शब्दाच्या म्हणजे नामाच्या पुढे लागतात व दोन्ही मिळून एकच शब्द तयार होतो उदा. रामाला या नामापुढे लागणाऱ्या शब्दानाच
विभक्तिचे प्रत्यय म्हणतात. संस्कृतात अशा आठ विभक्ति असतात त्यामुळे नामाचे एकवचनी द्विवचनी व बहुवचनी रूप व प्रत्येकाच्या आठ विभक्ति या प्रकारे संस्कृत मधे प्रत्येक शब्दाची २४ रुपे तयार होतात व तेवढीच पाठ करावी लागतात. त्या त्या विभक्तिमधला शब्द कुठे वापरायचा याचे इतके सोपे नियम आहेत कि संस्कृत पण सोपी होऊन जाते. शिवाय नामाची जी विभक्ति असेल, किंवा लिंग असेल तीच विभक्ति व तेच लिंग विशेषणासाठी पण लावावे लागते.
उदा. मी गहन वनात गेलो या मराठीत गहन या विशेषणाचं रुप वनात या शब्दाची सप्तमी विभक्ति असून देखील बदलले नाही. संस्कृत मधे मात्र ते बदलून गहने वने असं होते.

यानंतर येतात सर्वनामाचे प्रकार व विशेषणाचे. सर्वनामाचे प्रकार म्हणजे पुरुषवाचक सर्वनाम, निजवाचक, प्रश्नवाचक संबंधवाचक, तसेच विशेषणाचे प्रकार पण गुणवाचक, संख्यावाचक, प्रश्नवाचक, possessive, व demonstrative असे आहेत. या मधे आपण पहातो कि प्रश्नवाचक, possessive, व demonstrative शब्द विशेषणात्मक आणि सर्वनामात्मक अशा दोन्ही प्रकारे असू शकतात. उदा. What is your question? मधे what हे प्रश्नवाचक सर्वनाम आहे व या वाक्यातील कर्ता  what हा शब्दच आहे. पण तेच वाक्य what question did you ask अस केलं तर  what हे प्रश्नवाचक विशेषण बनतं. त्याला विशेषण म्हणून ओळखायची सोपी खूण अशी कि त्याच्या पुढे question हे नाम आहे हीच उदाहरणे possessive, व demonstrative adjective ला लागू पडतात. This is Jaya’s book या मधे this हे दर्शक सर्वनाम आहे व Jaya’s हा शब्द possessive adjective आहे. तेच वाक्य आपण This book is Jaya’s. अस म्हटल तर this हे adjective ठरत. That road is broad  आणि That is a broad road. या दोन वाक्यांमधे that हा शब्द एकदा demonstrative adjective व एकदा demonstrative pronoun म्हणून आलेला आहे.



शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

संगणक और हिन्दी -- जरूरत है मूलतत्व तक जाने की

संगणक और हिन्दी -- जरूरत है मूलतत्व तक जाने की


    हिंदी - संगणक

    हिंदी और साथ ही सारी भारतीय भाषाएँ आज एक गहरे संकट में पडी दीखती हैं।  वह संकट है, इन भाषाओं का बेमानी हो जाना।  अंग्रेजी का व्यवहार और चलन पूरी दुनिया में इस कदर बढ़ा है कि यह चिंता अन्य युरोपीय भाषाओं पर भी लागू होती है। लेकिन उनके समाधान के तरीके कुछ और होंगे जबकि हमारे तरीके कुछ और खोजने पडेंगे, क्योंकि हमारा प्रश्न भाषा के साथ साथ लिपी और वर्णमाला  का भी है।  मसलन ग्रीक और रशियन भाषाओं की लिपी अलग है लेकिंन उनकी वर्णमाला में भी उतने ही अक्षर हैं जितने अंग्रेजी में।  उनकी भाषा में व्यंजन और स्वरों को एक साथ जोड़ने की कोई रीति या नियम नहीं है।  वर्णमाला का हिसाब करें तो पूरे संसार में चार तरह की मुख्य वर्णमालाएँ हैं - संस्कृत, अरबी, चीनी और लैटिन (जिसमें ग्रीक, रोमन आदि शामिल हैं।) सवाल है इन्हें संगणक पर उपयोगी बनाने का।

    पहले हम देखें कि हमारी भाषाओं के बलस्थान क्या हैं।  दुनिया की आबादी करीब छः अरब है जिसमें करीब तीन-चार अरब जनता की या तो भाषा अंग्रेजी है या उन्हें अंग्रेजी का थोड़ा-अधिक ज्ञान है।  अंग्रेजी भाषाई लोगों के लिये युरोप की कम से कम दो अन्य भाषाएँ जानना अनिवार्य माना जाता है जिसमें फ्रेंच, जर्मन, स्पॅनिश, इटालवी, रशियन इत्यादि भाषाएँ आती हैं।

    भारत की जनसंख्या एक अरब अर्थात्‌ सौ करोड़ है जिसमें - साठ करोड़ लोग हिंदी बोल या समझ लेते हैं।  इससे महत्वपूर्ण बात यह है कि सारी भारतीय भाषाओं में अक्षर और अक्षर समूहों से शब्द बनाने का तरीका एक ही है।  अर्थात्‌ हमारी मूल लिपी एक ही हे और उसी के विभिन्न रूप या विभिन्न सजावट से अलग अलग भाषाओं की लिपी बनी है।  संगणक पर काम करने के लिए यह बडा ही उपयोगी हो जाता है क्योंकि केवल फॉन्ट बदल देने से ही हम हिंदी, बंगाली, पंजाबी और जो भी अन्य लिपियाँ हैं - उन्हें अपने सम्मुख लाकर उपयोग कर सकते हैं।

    हमारा दूसरा प्रबल पक्ष यह है कि वाक्य रचना के व्याकरण के नियम सभी भाषाओं  के लिए प्रायः एक जैसे हैं।  मैं रोटी खाती हूँ को अंग्रेजी में कहना है तो पहले उनकी वाक्य रचना का भेद सीखना पड़ेगा।  आप नहीं कह सकते आई रोटी ईट।  लेकिन बंगाली में कहने के लिये केवल शब्दशः भाषांतर कर देने से भी काम चल जाएगा।  अतः संगणक के लिये यह भी आसानी है कि यदि उसके पास शब्द कोष है तो वह खुद ही एक भारतीय भाषा से दूसरी भाषा में भाषान्तर कर लेगा। आपको बस थोड़ी सी मेहनत करनी होगी, खास खास जगहों पर।

    इसका अर्थ यह हुआ कि यदि हम संगणक तकनीक को अपनी भाषा के हिसाब से विकसित करते हैं तो उसके कई फायदे हैं। दूसरी ओर संगणक पर नई-नई तकनीकों का और सुविधाओं का विकास इतनी तेजी से हो रहा है कि यदि हमारी भाषा के हिसाब से हम उन सुविधाओं को नहीं ढाल पाये तो हमारी भाषाएँ पीछे छूट जाएँगी।  पिछले पाँच वर्षों में यह संकट तेजी से गहराया है और इसकी तेजी बढ़ने वाली है। 

    इंटरनेट और खास कर ई-मेल की सुविधाओं को देखकर अब यह डर लगने लगा है कि भविष्य में यदि सुदूर देशवासियों के साथ घरेलू पत्रव्यवहार भी अंग्रेजी में करना पडा, तो फिर भारतीय भाषाएँ कहाँ रहेंगी।  आने वाले पांच वर्षों के पहले ही हमारे देश के सारे प्रमुख शहर इंटरनेट पर सारी दुनियाँ के साथ जुडे होंगे।  दुनियाँ से जुड़े होने का मतलब होता है दुनियाँ के कोने कोने में जो अपने परिचित, अपने आत्मीय फैले हुए हैं, उनसे जुडे रहना। आज की तारीख में तो इस जुड़ाव के लिए आज तो अंग्रेजी भाषा ही अनिवार्य है।  यदि इस स्थिती में अंतर नहीं आया और भारतीय लिपियाँ इस जुडाव के लायक नहीं रह पाईं तो उनका बेमानी हो जाना अटल है।  परन्तु वे इस लायक बनी रहेंगी या नहीं यह सवाल आज भाषाविदों की झोली में नहीं बल्कि संगणक शास्त्रियों की झोली में जा पड़ा है।

    यह भी देखें कि हमारे देश में संगणक शास्त्र का फैलाव कैसे हुआ।

    पहले संगणकों का उपयोग हमारे देश के कतिपय वैज्ञानिक संस्थाओं में ही हुआ करता था। सन्‌ १९८० के बाद हर जिले में एन.आई.सी. के केन्द्र खुले और विभिन्न कार्यालयों में संगणकों का प्रसार सन्‌ १९९० के बाद तेजी से बढ़ा। सन्‌ १९८० से सन्‌ २००० के बीच में संगणकों की दुनिया मे काफी नए-नए अविष्कार और एप्लीकेशन हुए। नए सॉफ्टवेयर, साथ ही पुराने कई सॉफ्टवेयर को एकत्रित प्रणाली  (Operating System) में एक साथ लाने की व्यवस्था हुई। उदाहरण के लिए - word, excel, power point, paint आदि  microsoft office system के कई काम एक ही तरीके से किए जाते हैं। नए एप्लीकेशन में ई-मेल और उसके बाद मोबाईल फोन से ई-मेल और ई-मेल से मोबाइल फोन पर sharing जैसी सुविधाएँ सामने रहीं हैं। इसी तरह कई क्रांतिकारी बातें आने वाले वर्षों में भी संगणकों पर होती रहेंगीं।

    संगणक आधारित शोध कार्यों के लिए मानवी संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत सी-डैक का गठन हुआ।  'सी-डेक' ने संगणक के एप्लीकेशन के अनुरूप देवनागिरी लिपी पर आधारित सॉफ्टवेयर बनाने के लिए  प्रयास किया, किन्तु संगणक की मुख्य प्रणाली को हाथ नहीं लगाया। यहाँ रुककर हमें पहले कुछ मौलिक सिद्धांत समझने पड़ेंगे

अंग्रेजी में अंग्रेजी के अक्षर, अंक एवं सामान्य संकेत चिन्हों को 1 एवं जैसे सांकेतिक विद्युत्‌ चिन्हों में बदलकर कम्प्यूटर को समझाया जा सकता है। इस पद्धति को ऋच्क्क्ष्क्ष् क्दृड्डत्दढ़ कहते हैं। इसी प्रकार की कोडिंग देवनागिरी अक्षरों के लिए करने की आवश्यकता है जो नहीं की गई है। हालाँकि ऐसी क्ष्च्क्क्ष्क्ष् की शुरूआत तो की गई लेकिन इसके आगे प्रयोग नहीं किये गए।

    इसी वजह से हिन्दी में किसी भी सॉफ्टवेयर को मूलरूप से बनाने में दिक्कतें आती हैं। अंग्रेजी के नए सॉफ्टवेयर हिन्दी में ढालने के लिए भी अतिरिक्त समय और पैसा व्यर्थ होता है। हर नये आविष्कार या software को हिन्दी में उतारने के लिए ४-५ वर्ष लग जाते हैं इसलिए आवश्यक है कि संगणकों पर हिन्दी को लाने के लिए ऐसा मूलभूत काम हो ताकि संगणक का bios, processing chip, पर लगी चिप के assembly language के प्रोग्राम भी हिन्दी के माध्यम से किए जाए तभी संगणकों पर हिन्दी भाषा को आसानी से क्रियान्वित किया जा सकता है।

चूँकि कईयों का संगणक-ज्ञान सीमित है अत कुछ मौलिक सिद्धांत पहले समझने पडेंगे।

१)  संगणक का प्रयोग प्रकार से होता है - भाषा - व्यवहार
    गणित के पेंच सुलझाना
    तथ्यों की छानबीन - spread sheet, graphs, आकृतियाँ
    दो और तीन आयाम वाले मॉडेल तथा सिम्यूलेशन प्रशिक्ष

२)  संगणक प्रणाली को समझने का एक सरल तरीका है।  याद करें कि भाषा प्रणाली का विकास कैसे हुआ - वही प्रक्रिया संगणक में भी होती है।

    जब भाषा का विकास आरंभ हुआ तो पहले संकेत और शारीरिक हावभाव, फिर ध्वनियाँ, फिर चित्राकृतियाँ और फिर लिपी बनी।  फिर शब्द-भंडार बना। फिर व्याकरण के नियम बने, उनके अंतर्गत वाक्य रचना बनी।  फिर विभिन्न विचार, सिद्धांत इन वाक्यों के माध्यम से व्यक्त होने लगे।  फिर छंदबद्धता आई, सूत्र बने और गणित बना।  यों भाषा का विकास हुआ। 


    संगणक को भी अपनी एक लिपी, एक शब्दभंडार एक व्याकरण और एक छंद-नियमों की आवश्यक होती है।  हमें यदि संगणक के माध्यम से ज्ञान का आदान-प्रदान करना है तो हर सीढी पर मेल बैठाना होगा और एक man to machine methodology की जरूरत होगी।

३)  संगणक के साथ ज्ञान का सारा आदान-प्रदान अंततः संगणक की लिपी में ही करना पड़ेगा अर्थात्‌ हाँ और ना। इसे 1 और के रुप में भी लिखा जाता है। हमारी लिपी में कई अक्षर हैं। इनका मिलान करने के लिये एक coding चाहिए। अंग्रेजी में मिलान का जो code बना उसका नाम है unicode  हिंदी के लिये अभी ऐसा code नहीं बना। मिलान का तरीका यूँ है कि 1 या के १६ संकेतों की एक पंक्ति बनाते हैं (chain) जिससे कुल २५६ तरीके की पंक्तियाँ बन सकती हैं।  इन्हींसे हमारी लिपी के सारे अक्षर बन सकते हैं।

    इसके अलावा संगणक को आरंभ करते समय हर बार कुछ शुरुआती काम पूरे करने पड़ते हैं।  उन्हें रोज-रोज बताना पड़े इसके लिये bios, या machine code एवं assembly language बनाने पड़ते हैं ताकि संगणक अपने आपको काम के लिये तैयार कर सके। 

    इस प्रकार संगणक और हमारी भाषा के बीच कई सीढ़ीयाँ हैं।  संगणक के छोर से देखें तो हर सीढ़ी पर मानवी भाषा का प्रमाण बढ़ जाता है।  अन्तिम सीढ़ी में हम वहाँ पहुँचते हैं जहाँ हम केवल अपनी भाषा में ही काम करते हैं और संगणक उसे उन सारी सीढ़ीयों से उतारते हुए अपनी भाषा में ढ़ाल लेका है।  लेकिन इन सीढ़ीयों की रचाना, उनका व्यवहार, वहाँ होने वाले काम इत्यादि हमारे ही वैज्ञानिकों ने पहले से किये होते हैं और उनकी भाषा रही है अंग्रेजी। 

    इसी लिये यदि हम संगणक पर व्यवहार लिखना चाहें, तो अंतिम सीढ़ी पर आकर हमें एक सॉफ्टवेअर थमा दिया जाता है जो देवनागरी लिपी में है लेकिन उससे एक सीढ़ी पीछे के काम भी हमें करने हों, जैसे की संगणक से कहना हो कि हम उस सॉफ्टवेअर में काम करना चाहते हैं, तो यह बात भी संगणक से अंग्रेजी में कहनी पड़ेगी। 

01111001, 01010001, 10100010,
एक सांकेतिक चित्र साथ में बना है।  हर डॉट मानवी लिपी का correspomdence दर्शाता है।  तो अभी तक C-Dac केवल इस हद तक कामयाब हुई है कि अंतिम छोर पर आकर हिंदी भाषा -व्यवहार के लिये हिंदी लिपी का प्रयोग हो। परंतु जहाँ संगणक के मूल काम आरंभ होते हैं, उन व्यवहारों में हिंदी की पहुँच जब तक नहीं होती तब तक हम संगणकीय सुविधाएँ हिंदी भाषिकों को नहीं दे सकते।

व्यावहारिक

    एक बहुत बड़ी व्यावहारिक समस्या यह है कि संगणक के मौलिक काम हिंदी भाषा के माध्यम से होने के कारण आज जब संगणक हिंदी लिपी को पढ़ता है, तो केवल चित्रों के रुप में।  अत यदि इन चित्रों को codify किया जाय और एक computer दूसरे computer की standardisation हो, तो एक संगणक पर किया गया काम दूसरे संगणक के लिये बेकार हो जाता है।  जिस प्रकार अंग्रेजी में किसी computer पर किये गये काम को machine language में लाया जा सकता है, वैसी सुविधा हिंदी में नहीं है।  इससे नतीजा यह है कि संगणक की सुविधा हमारे हिंदी गद्य-लेखन के काम में भी केवल १० या २० प्रतिशत ही उपयोगी हो सकती है और बड़े परिमाण में हम हिंदी व्यवहारों को संगणक के पूरे utilisation से वंचित रखते हैं।

    सभी सरकारी कार्यालयों में हिंदी में कम्प्यूटर पर कार्य करने के लिए मुख्यतः लीप ऑफिस सॉफ्टवेयर का प्रयोग किया जाता है। लीप ऑफिस में मुख्यतः तीन तरह के ख़्ड्ढन््रडदृठ्ठद्धड्ड - क्ष्दद्मड़द्धत्द्रद्य, हिंदी टाईपराईटर तथा घ्ण्दृदड्ढद्यत्ड़ प्रयोग में लाए जाते हैं जिनमें से क्ष्दद्मड़द्धत्द्रद्य ख़्ड्ढन््रडदृठ्ठद्धड्ड को सीखना अत्यंत आसान होता है, और यह दो दिनों में सिखा जा सकता है परन्तु सी-डैक ने कभी भी इसका प्रचार नहीं किया है, और यह बात अपनी वेब-साइट में भी उजागर नहीं की है।

लीप ऑफ़िस में कार्य करने में आने वाली कुछ कठिनाइयाँ निम्नलिखित है -

१)  लीप ऑफ़िस की क़ीमत लगभग १२,५००/- रुपये है, जो कि एक सामान्य आदमी के लिए काफ़ी ज़्यादा है। सामान्य सरकारी कार्यलयों के अलावा लाखों लोग हर साल कम्प्यूटर खरीदतें है, लीप   ऑफ़िस एक  हिंदी का मूल वर्ड प्रोसेसर (word processor) है, जो कि कंप्यूटर के साथ प्री-इनसटालड (pre-installed) आना चाहिए जैसे कि अंग्रजी का वर्ड पैड आता है, तभी हिंदी का प्रचार एवं प्रसार संपूर्ण रूप से हो सकेगा।
२)  लीप ऑफ़िस के फौंट का सीधे एम एस वर्ड (MS word) या एम एस एक्सेल (MS excel) और एम एस पावर पाइंट (MS power point) में प्रयोग संभव नहीं है। इसको करने के लिए सी डैक के दूसरे साफ्टवेयर आई एस एम ऑफ़िस (ISM office) का उपयोग करना पड़ता है जिसकी क़ीमत  ४०००/-रुपये के लगभग है।
३)  'लीप ऑफ़िस' में हिंदी वर्णमाला के अनुसार sorting नहीं हो पाती है। लीप ऑफ़िस से जब     हम एम एस एक्सेल (MS excel) कंप्यूटर पैकेज का प्रयोग करते हुए डाटा की key-in करते है तो डाटा हिंदी वर्णमाला के अनुसार sort नहीं होता है।
४)  लीप ऑफ़िस में 'वेब-पेज' बनाने पर शब्द टूट जाते हैं।
५)  'लीप-ऑफ़िस' से जब हम ई-मेल भेजते हैं, तो ई-मेल पाने वाले को संदेश अँग्रेजी junk  के रूप में  मिलता है, उसे  पढ़ने  से पहले  पाने  वाले को  'फौंट'(font) 'डाउन लोड' करना पड़ता है। हालाँकि सी डैक (C-Dac) ने  अपनी वेब साइट पर वह फौंट दिया है, फिर भी  ई-मेल पढ़ने वाले को निम्नलिखित  कठिनाइयाँ  होती है -
    क)  फौंट डाउनलोड कहाँ से करना है  उसे यह पता नहीं होता है।
    ख)  फौंट डाउन लोड करने में समय नष्ट होता है।
    ग)  वेबसाइट का पता ढूँढ़ना पड़ता है। हालाँकि लीप ऑफ़िस से भेजी गई ई-मेल के साथ एक संदेश स्वतः जुड़ जाता है जो कि फौंट डाउन लोड करने की .जरूरत बताता है, लेकिन वह संदेश स्पष्ट रूप से वेब साइट  का पता एवं  फौंट डाउन लोड करने का तरीक़ा नहीं बताता है।
    घ)  सामान्यतः लोगों को फौंट डाउन लोड करना एवं अपने कंप्यूटर पर लोड करना नहीं आता है।
६)  सी-डेक (C-Dac) की वेब-साइट पर यह स्पष्ट रूप से लिखा होना चाहिए कि अन्य सभी पैकेजों की तुलना में inscript का प्रयोग बहुत ही आसान है।
७)  पुराने वर्जन के लीप ऑफिस सॉफ्टवेयर को नए वर्जन में convert करने के लिए विक्रेता लगभग २०००/- रूपये लेते हैं जबकि यह कीमत कम होनी चाहिए और सी-डैक की साइट पर स्पष्ट रूप रूप से लिखी होनी चाहिए सम्भवतः  लीप ऑफिस का update version फ्री दिया जाना चाहिए।
८)  लीप ऑफिस की जगह अगर हिंदी टाइपिंग के लिए आई.एस.एम. ऑफिस का प्रयोग करते हैं तो आई.एस.एम. ऑफिस में हिंदी के शब्द टूट जाते हैं।
 संकट
    हिंदी अर्थात हिंदी एवं अन्य सभी भारतीय भाषाएँ, जिनकी अक्षर रचना एक समान है, के बेमानी या अप्रासंगिक हो जाने के संकट का रोकना।

संकट की मुख्य दिशा

    संकट कई दिशाओं से है और रोकने के प्रयास भी कई दिशाओं में करने होंगे। लेकिन सबसे तीव्र और वेगवान संकट इंटरनेट के ई-मेल के माध्यम से रहा है।

सहयोग के माध्यम

    यह सहयोग भी कई दिशाओं से उपलब्ध होना पड़ेगा और इसके कई आयाम होंगे।

1.   तकनीकी
२.  आर्थिक संबल
३.  प्रशासकीय संबल
४.  भाषाविदों का सहयोग
५.  विचारवान्‌ व्यक्तियों का नैतिक दबाव
६.  उद्योजक और उत्पादकों का सहयोग

समस्या के निकटवर्ती प्रशासनिक विभाग

1.   राज्यभाषा विभाग क़्.ग््र.क.
२.  क़्.ग््र.क.
३.  ग़्.क्ष्.क्.
४.  क़्. दृढ -ङ.
५.  क़्. दृढ च्च््र.

राजभाषा विभाग का रोल

१)  हिंदी software बनाने वाली सभी कंपनियों की meeting बुलाकर उन्हें storage code के standardisation के लिये कहा जाय।

२)  क़्ग््रक से उनकी ड़दृथ््रद्रठ्ठद्यत्डत्थ्त्द्यन््र की सुविधा पर द्धड्ढद्मड्ढठ्ठद्धड़ण् करवा कर ड़दृथ््रद्रठ्ठद्यत्डत्थ्त्द्यन््र के लिये त्दद्मत्द्मद्य किया जाय।

३)  चूँकि सरकार इन द्रठ्ठड़त्त्ठ्ठढ़ड्ढद्म के लिये एक डद्वथ्त्त् ड़दृदद्मद्वथ््रड्ढद्ध है, अत द्मदृढद्यध््रठ्ठद्धड्ढ कंपनियों पर दबाव डाल कर द्रद्धत्ड़त्दढ़ द्रदृथ्त्ड़न््र, थ्दृड़त्त्त्दढ़, द्रत्द्धठ्ठड़न््र आदि मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हो।  जिसे द्रत्द्धठ्ठड़न््र कह कर नकारा जाता है।  उसकी खुलेआम छूट हो और उसके फायदों से खासकर डत्ढ़ढ़ड्ढद्ध थ््रठ्ठद्धत्त्ड्ढद्य द्धड्ढठ्ठड़ण् के फायदे से द्रद्धदृड्डद्वड़ड्ढद्धद्म को ड़दृदध्त्दड़ड्ढ किया जाय।

४)  क़्ग््रक और क्-क़्ऋक् या अन्य तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से मौलिक प्रक्रिया में ही हिंदी को लाया जाय।

५)  ग़्ङक्ष् विशेषज्ञों को आवाहन कर उन्हें द्धड्ढद्मड्ढठ्ठद्धड़ण् के लिये प्रवृत्त किया जाय।

६)  सरकारी कार्यालयों में आज हिंदी द्रठ्ठड़त्त्ठ्ठढ़ड्ढद्म की क्या दिक्कतें हैं, इस विषय में -ग््रक़्'द्म को द्मड्ढदद्मत्द्यत्ड्ढ कराने का कार्यक्रम शुरु किया जाय।

७)  इस दिशा के द्धड्ढद्मड्ढठ्ठद्धड़ण् को ढद्वदड्डत्दढ़ करवाया जाय।

८)  हिंदी के विचारवंनों की गोष्ठी बुलाकर उनसे एक द्रद्धड्ढद्मद्मद्वद्धड्ढ ढ़द्धदृद्वद्र के रुप में काम करवाया जाय।

९)  शब्दकोषों को बढ़ावा दिया जाए।
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