रविवार, 6 दिसंबर 2020

अध्याय १ मनुष्य श्रद्धामय है

 

१ मनुष्य श्रद्धामय है

मनुष्य श्रद्धामय है। बिना श्रद्धाके मनुष्य मिलना संभव नही है। यदि वह नास्तिक भी हुआ तो भी "ईश्वर नही है" इस विचारको वह हमेशा पकडे रहता है। ये उसकी एकप्रकारसे श्रद्धा ही हुई।

"कल सुबह मुझे फिरसे जाग आयेगी" ये श्रद्धा हो तभी मनुष्य आज सो सकता है। नही तो उसका सोना भी दुःश्वर हो जायेगा। अगर किसीने उसकी श्रद्धाको डगमगाया तो वह स्वयं डगमगा जायेगा।

श्रद्धा कुएँके मेंढक की भी हो सकती है, या " अहं ब्रह्मास्मि" कहनेवालेकी भी हो सकती है।

इसीलिये गीता कहती है --

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥

जैसी जिसकी श्रद्धा होती है, वैसाही वह मनुष्य होता है। जैसी श्रद्धा वैसा ही मनुष्यका अंतःकरण।

श्रद्धा -- भूमिका -- किं कर्तव्यं किमर्थम्

 

भूमिका

किं कर्तव्यं किमर्थम्

जिस प्रकार एक व्यक्तिमें श्रद्धा होती है उसी प्रकार समाजकी एक श्रद्धा होती है और राष्ट्रकी भी एक श्रद्धा होती है। जिस राष्ट्रकी श्रद्धा जैसी हो वह राष्ट्र वैसा ही बनेगा। हजारों वर्षोंसे भारत राष्ट्रने यह श्रद्धा बनाए रखी कि मनुष्य समाजमें मनुष्यका मूल चरित्र लुटेरोंका नहीं है, वरन आपसी सद्भाव, मैत्री, करुणा आदि भावनाएं ही मनुष्यका मूलस्वभाव है। इसी प्रकार सत्य और ज्ञानकी अन्वेषणा भी मनुष्यका मूलस्वभाव है।

अतएव समाजकी मार्गदर्शक जो भी नियमावली बनी उसमें सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रम्हचर्य, संतोष, अपरिग्रह, निरंतर अभ्यास, शौर्य, न्यायभावना, शुचितापूर्ण व्यापार, राष्ट्रप्रेम इत्यादि गुणोंको उत्तम माना गया। उन गुणोंका संस्कार मनुष्यमें हो सके इस प्रकारकी समाज व्यवस्था बनानेका प्रयास भारतवर्षमें वारंवार किया गया।

इस पुस्तककी भूमिका लिखते हुए स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि इस विषयपर पुस्तक क्यों लिखी जाए। इसका कारण यही है कि हमें सर्वप्रथम यह समझना है कि हम भारत राष्ट्रको किस प्रकार बनाना चाहते हैं। आनेवाली पीढ़ियां क्या संस्कार लेकर आएँ और कितनी पीढ़ियोंतक यह संस्कार चलने चाहिए? इसके लिए सबसे पहले हमें निश्चित करना होगा कि हमारी अगली पीढ़ियोंकी श्रद्धा किन बातों में हो। फिर प्रश्न उठेगा कि वैसी श्रद्धा भारत राष्ट्रके नागरिकोंकी बनी रहे इसके लिए जो भी समाज व्यवस्था आवश्यक है क्या वह आज हमारे पास है? और यदि नहीं है तो हम उसे किस प्रकार निर्माण कर सकते हैं? तो मेरे विचारमें श्रद्धा और अंधश्रद्धाके बीचके अंतरको स्पष्टतासे उजागर करनेका प्रयोजन इस पुस्तकका नहीं है। मेरे विचारमें इस पुस्तकका उद्देश्य यह है कि अपने राष्ट्रको, राष्ट्रकी अगली पीढ़ियोंको हम किन विचारोंसे, किस प्रकारकी श्रद्धासे संस्कारित रखना चाहते हैं और उसके लिए हम कौनसे प्रयास करें!

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अध्याय १अ -- श्राद्धका अर्थ

 

रघोत्तम शुक्ल।

श्राद्धका अर्थ श्रद्धासे है, जो धर्मका आधार है। माता पार्वती और शिवको ‘श्रद्धा विश्वास रूपिणौ’ कहा गया है। पितृ-पक्ष हमें अपने पितरोंके प्रति श्रद्धा व्यक्त करनेका अवसर प्रदान करता है। हिंदू धर्ममें मान्यता है कि मानव शरीर तीन स्तरोंवाला है। ऊपरसे दृश्यमान देह स्थूल शरीर है। इसके अंदर सूक्ष्म शरीर है, जिसमें पांच कर्मेंद्रियां, पांच ज्ञानेंद्रियां, पंच प्राण (प्राण, अपान, व्यान, उदान समान), पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, वायु) के अपंचीकृत रूप, अंत:करण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार), अविद्या, काम और कर्म होते हैं। इसीके अंदर कारण शरीर होता है, जिसमें सत, रज, तम तीन गुण होते हैं। यहीं आत्मा विद्यमान है। मृत्यु होनेपर सूक्ष्म और कारण शरीरको लेकर आत्मा स्थूल शरीरको त्याग देता है।

मान्यता है कि यह शरीर वायवीय या इच्छामय है और मोक्ष पर्यंत शरीर बदलता रहता है। दो जन्मोंके बीचमें जीव इसी रूपमें अपनी पूर्ववर्ती देहके अनुरूप पहचाना जाता है। मरणोपरांत जीव कर्मानुसार कभी तत्काल पुनर्जन्म, कभी एक निश्चित कालतक स्वर्गादि उच्च या नरकादि निम्न लोकोंमें सुख-दुख भोगकर पुन: जन्म लेता है। अधिक अतृप्त जीव प्रबल इच्छाशक्तिके चलते यदाकदा स्थूलत: अपने अस्तित्वका आभास करा देते हैं। उचित समय बीतनेपर ये पितृलोकमें निवास करते हैं। ‘तैतरीय ब्राह्मण’ ग्रंथके अनुसार, भूलोक और अंतरिक्षके ऊपर पितृलोककी स्थिति है।

पौराणिक ग्रंथोंके अनुसार, देव, पितृ, प्रेत आदि सभी सूक्ष्म देहधारी भोगयोनिमें हैं, कर्मयोनिमें नहीं। उनमें आशीर्वाद, वरदान देनेकी असीम क्षमता है, किंतु स्वयंकी तृप्तिके लिए वे स्थूल देह धारियोंके र्पण पर निर्भर हैं। महाभारतमें पितरोंको ‘देवतानां च देवता’ कहा गया है, क्योंकि देव तो सबके होते हैं, पितृ अपने वंशजोंके हित साधक। पितरोंको संतुष्ट करनेके लिए श्राद्ध यानी पिंडदान व तर्पण आवश्यक माना गया है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं :

तरपन होम करैं विधि नाना। विप्र जेवांइ देहिं बहु दाना।।

श्राद्ध का अर्थ श्रद्धा से है, जो धर्म का आधार है। कहा गया है :

श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावहि कोई।।’

माता पार्वती और शिव ‘श्रद्धा विश्वास रूपिणौ’ कहे गए हैं। हमारे धर्म ग्रंथोंमें पितृगणको तृप्त करने हेतु एक पखवारा अलगसे निश्चित है। यह भाद्रपद पूर्णिमासे क्वारकी अमावस्यातक होता है। जिस तिथिको, जिसका जो पितृ दिवंगत हुआ हो, उस तिथिको उसका श्राद्ध किया जाता है। तीन पिंड दिए जाते हैं- परबाबा, बाबा और पिता। इन्हें भूमिपर कुश बिछाकर अर्पण करते हैं। मुख दक्षिणकी ओर करना चाहिए।

श्राद्ध प्रकाश’ व अन्यान्य ग्रंथोंमें इनके विधि-विधानका वर्णन है। इनके अनुसार, चंद्रमामें जो केंद्र स्थान है, उस स्थानके ऊपरके भागमें, जो रश्मि ऊपरकी ओर जाती है, उसके साथ पितृप्राण व्याप्त रहता है। कृष्ण पक्षकी प्रतिपदामें मध्याह्नके समय जो रश्मि ऊपरकी ओर जाती है, वह इस समय १५ दिनको पृथ्वीकी ओर हो जाती है, जब चंद्रमा ध्रुवसे दक्षिण ‘विश्वजित’ तारेकी ओर जाता है, तभीसे चंद्र चक्र तिरछा होने लगता है। तब ऊपरके भागमें जो पितृप्राण रहता है, वह पृथ्वीपर आ जाता है और अपने परिवारमें घूमता है।

मान्यता है कि उस समय उसके नामसे उसका पुत्र या परिवार तर्पण या जौ, चावलका जो पिंड देता है, उसमेंसे अंश लेकर चंद्रलोकमें अंभप्राणको ऋण चुका देता है। इसीलिए इसे पितृपक्ष कहते हैं। मालूम हो कि हर प्राणीपर जन्मसे तीन ऋण होते हैं - देव, पितृ और ऋषि ऋण। पितृऋणकी पूर्ति पितृयज्ञ यानी श्राद्धसे होती है। इस रश्मिका नाम ‘श्रद्धा’ भी कहा गया है। चूंकि यह रश्मि मध्याह्नमें आती है, अत: श्राद्ध कर्म हेतु मध्याह्नसे अपराह्न यानी १२ से के बीचका समय ही श्रेयस्कर माना जाता है, जिसे ‘कुतुप’ काल कहते हैं।

वराह पुराण’ के अध्याय १९० के अनुसार, चारों वर्णोंके लोग श्राद्धके अधिकारी हैं। माना जाता है कि जलाशयमें जाकर एक बूंद जल भी पितरोंको श्रद्धासे अर्पित कर दें, तो वे तुष्ट होकर आशीर्वाद दे देते हैं। वराह पुराण कहता है यदि व्यक्ति साधनहीन है और कहीं वन प्रदेशमें है, तो दोनों हाथ उठाकर पितरोंको अपनी स्थिति बताकर श्रद्धा समर्पण कर दे, तब भी वे प्रसन्न होकर आशीष दे देते हैं। वशिष्ठ सूत्र और नारद पुराणके अनुसार, गयामें श्राद्धका बहुत महत्व है। स्कंद पुराणानुसार बदरिकाश्रमकी ‘गरुड़ शिला’ पर किया गया पिंडदान गयाके ही बराबर माना जाता है। श्राद्धमें श्रद्धाका सर्वाधिक महत्व है। यदि इसे पूरी श्रद्धाके साथ नहीं किया जाता तो इसे करना निरर्थक है।

न तत्र वीरा जायन्ते नारोगो न शतायुष:

न च श्रेयोऽधिगच्छन्ति यत्र श्राद्धविवर्जितम।।

[लेखक आध्यात्मिक विषयों के अध्येता हैं]

बुधवार, 25 नवंबर 2020

Bashing manusmriti

 


This new paper of mine published by Indic Today may interest some members. 
In this paper, I try to tackle some of the important but difficult questions regarding the authenticity of Manusmriti as a text and as a Shastra, including questions related to origination, composition, authorship, and transmission.

Abstract
Starting from George Bühler in the 19th century to Patrick Olivelle and Wendy Doniger of our own times, Western scholarship has had a long engagement with the text of Manusmṛti. Though their engagement has been long and at many different levels, one thing with which they are yet to come to terms with is the sheer size of the text as well as the wide range of the subject matter covered in it.
In this paper, I contend that the predominant position of modern scholarship on the composition and integrity of the text of Manusmṛti is problematic as it side-lines the evidence presented by the native tradition regarding how the text has been received within the tradition.

In this paper, I contend that the predominant position of modern scholarship on the composition and integrity of the text of Manusmṛti is problematic as it side-lines the evidence presented by the native tradition regarding how the text has been received within the tradition.

It will be shown that a careful understanding of the native accounts of the origination of the text as well as the general process of transmission of knowledge prevalent in the Hindu tradition clearly points to Manusmṛti as a carefully created text with unitary authorship. It will be further shown how the very narrative structure of the text as well as its deeper architecture supports the position of unitary authorship.

Regards,
Nithin

शनिवार, 14 नवंबर 2020

महंगी शिक्षा -- समस्या एवं समाधान

 महंगी शिक्षा -- समस्या एवं समाधान

महंगी शिक्षा की समस्या निवारण 

खंड 1 भारतीय पद्धति,  ब्रिटिश पद्धति सरकारी, कॉर्पोरेट पद्धति 

खंड 2 डाटा एनालिसिस 

प्रभाग 4 शिशु प्राथमिक माध्यमिक उच्च तंत्र प्रांत वार लिंग वार जाति वार 

५ स्पेशल परपज यथा नवोदय वनवासी कल्याण महिलाएं 

६ रोजगार बेरोजगार 

७ उद्योजकता 

८ परदेशगमन 

खंड 3 उपाय 

प्रभाग ९ मातृभाषा, ऑनलाइन, मोर बुक नीडेड  

प्रौढ शिक्षा इनफॉर्मल कौशल शिक्षा फील्ड स्टडी 

प्रभाग १० ऑडियो वीडियो अप्रेंटिस वानप्रस्थ सब पढ़े सब बढ़े ईच वन टीच वन