Friday, August 5, 2011

Suggestion to MPs-- संगणक पर हिन्दी व भारतीय भाषाओंको को प्रस्थापित करने हेतू

संगणक पर हिन्दी व भारतीय भाषाओंको को प्रस्थापित करने हेतू
संविधान की धारा --- में राजभाषा के रूप में हिन्दी को प्रस्थापित करने के लिये पंद्रह वर्षका समय नियत किया गया और जनता, लोकसभा सदस्य तथा सरकार, सभी को यह जिम्मा दिया गया कि उसके लिये सफल प्रयास करें। राजभाषा हिंदी के साथ-साथ सभी भारतीय लिपियाँ व भाषाओंके लिये भी प्रायः ऐसा ही निर्देश दीया गया।
आजके संगणकके युग में जो भाषा या लिपी संगणक पर प्रस्थापित नही होगी उसका प्रभाव, उपयोग एवं व्यावहारिकता क्षीण होते चलेंगे। संगणक पर हिंदीसहित सभी भाषाओंको सुदृढ स्थान मिलनेके उद्देशसे पुणे स्थित सरकारी संस्था सीडॅकने 1988 में एक अच्छा प्रयास किया जिसके फलस्वरूप संगणक पर टंकन (टायपिंग) करने के लिये एक अति-सरल व सुलभ पद्धति बनी। इन-स्क्रिप्ट नामक इस कुंजीपटल-पद्धति में की-बोर्डकी प्रत्येक कुंजीको देवनागरीके एक-एक वर्णाक्षरके लिये आरक्षित किया गया। अर्थात् एक कुंजीसे संगणकको उसी एक वर्णाक्षरका निर्देश मिलेगा। इस प्रकार प्रत्येक कुंजीका इन-स्क्रिप्ट विधामें मानकीकरण हुआ। इसी मानकको 1991 में ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टॅण्डर्डने अपनाया और आगे चलकर विश्वस्तर पर यूनीकोड ने भी यही मानक अपनाया। यूनीकोड द्वारा मानक अपनाने का अर्थ और परिणाम यह हुआ कि इस मानकके साथ जो भी सॉफ्टवेअर देवनागरी लिखनेके लिये बनेगा उसके उपयोगसे लिखे आलेख (डॉक्यूमेंट) इंटरनेट पर आलेख के रूप में ही रहेंगे, जंक नही दिखेंगे।
ऐसा सॉफ्टवेअर मायक्रोसॉफ्टने सीडॅककी मददसे बनाया, परन्तु उसमें केवल एक ही फॉण्टकी सुविधा उपलब्ध कराई जो मंगल फॉण्ट है। यह फ्री (मुफ्त) उपलब्ध है और इसे संगणकपर संस्थापित करनेके बाद ई-मेल भेजने के लिये भी याहू या जीमेल पर डायरेक्ट हिंदी-टायपिंग की जा सकती है। यहाँ एक तकनीकी मुद्दा समझना आवश्यक है कि कुंजीयोंपर वर्णाक्षरोंको आरक्षित करना एक प्रकारका मानक है और कुंजीसे प्राप्त निर्देशको संगणक अपने संग्राहक (हार्ड डिस्क) पर किस फार्मूलेसे जमा करेगा यह एक अन्य मानक होता है। सामान्य भाषा में इन्हें निर्देश-तंत्र-मानक व संग्रह-तंत्र-मानक कहा जा सकता है। सीडॅकद्वारा दोनों प्रकार के मानक विकसित हुए और उनकी सरलता में ही उनका सामर्थ्य व उपयोगिता थी। इसी सरलता के कारण वह दोनों मानक पहले लीनक्स ऑपरेटिंग सिस्टममें और बाद में यूनीकोड मानक-प्रणाली पर अपनाये गये। लीनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम द्वारा अपनाये जानेपर (लगभग 1998 के आसपास) भारतीय मार्केट बचाये रखने के लिये मायक्रोसॉफ्टने भी अविलंब (सन 2002 के आसपास) मंगल फॉण्ट उपलब्ध कराया।
यह बात और इन पृष्ठों पर लिखी हर बात सभी भारतीय भाषाओंपर लागू है क्योंकि सबकी वर्णमाला एक है। अतः इन-स्क्रिप्ट कुंजीपटल प्रत्येक भारतीय भाषा के लिये समान रूपसे लागू है। मायक्रोसॉफ्टने हर भारतीय भाषा के लिये एक-एक मुफ्त फॉण्ट उपलब्ध कराया है।
संगणकपर भाषा लिखने-पढने हेतू एक तीसरे मानककी भी आवश्यकता होती है जो फॉण्टकी अर्थात् वर्णाकृतिकी सुघडता व सुंदरता को सुनिश्चित करता है। इसे हम दृश्य-निर्देश-तंत्र कह सकते हैं। सीडॅकने वह मानक भी बनाये और आज उनके पास एक विशाल फॉण्ट-भंडार है जिसमें सौ के लगभग विभिन्न आकृतियोंवाले फॉण्ट उपलब्ध हैं। इनकी आवश्यकता प्रिंटिंग के लिये भी है और इसलिये भी कि आपके आलेख में यदि सर्वदा एक ही एक फॉण्ट दिखेगा तो उससे एक प्रकार का फॉण्ट-फटीग अर्थात वितृष्णा उत्पन्न होती है। अंगरेजी में भी कई फॉण्ट हैं।
प्रश्न है कि संगणकपर हिंदी-विकास के इस लम्बे अंतराल में सीडॅकने क्या किया। सीडॅकने अपने खुदके हिंदी-सॉफ्टवेअरोंमें कुंजीपटलके हेतु इन-स्क्रिप्ट का निर्देश-तंत्र-मानक और फॉण्टों के लिये बने दृश्य-तंत्र-मानक अपनाये किन्तु संग्रह-तंत्र-मानक नही अपनाया अतः उनके सॉफ्टवेअर के मार्फत लिखे आलेख इंटरनेटमें जंक हो जाते हैं। उनकी भारी-भरकम कीमत भी है। मायक्रोसॉफ्टके लिये मानक-आधारित मंगल फॉण्ट बना देने के बाद अब जाकर 2005-09 के अंतराल में करीब नये 20 फॉण्ट बनाये हैं जो बी.आय.एस. व यूनीकोडके संग्रह-तंत्र-मानक के अनुरूप हैं अतएव इंटरनेटमें जंक नही होंगे। सीडॅक व डी.आई.टी. के अधिकारी-गण तिस-तिस सेमिनारमें हाजिरी लगाकर जादूगरके जम्हूरेकी तर्जमें जेबसे एक सीडी निकालकर दिखाते हैं कि लो, इसमें इंटरनेट-कम्पॅटिबल (इंटरनेटपर टिकनेवाले) और फिर भी मुफ्त बीसियों फॉण्ट हैं, सीडॅकको पत्र लिखकर इसे मंगवा लीजिये।
पाँच माँगें --
इस पृष्ठभूमि में हमारी पहली माँग है कि राजभाषा व डीआयटी के वरिष्ठ अधिकारी इन-स्क्रिप्ट कुंजीपटलकी सरलता को स्वयं देखें और हॅण्डस-ऑन ट्रेनिंग करें। हमारा दावा है कि यह कुंजीपटल समझने हेतू पाँच मिनट, हॅण्डस-ऑन ट्रेनिंग हेतू दस मिनट व कामचलाऊ स्पीड के लिये दो दिन पर्याप्त हैं, पर इस ट्रेनिंगके बिना वे संगणकपर हिंदी को प्रतिष्ठित करने हेतू किसी भी स्कीम को समझने और कार्यान्वित करने में अक्षम हैं।
दूसरी माँग है कि इस ट्रेनिंगके पश्चात वे मोबाइल कंपनियों के साथ बैठक कर यह नितान्त सरल पद्धति मोबाइल पर उपलब्ध कराने हेतू उन्हें प्रेरित करें।
सीडॅक की वेब-साइटसे उन उपरोक्त बीसियों फॉण्टोंको फ्री-डाउनलोड के लिये उपलब्ध कराया जाय ताकि जब भी-जिसे भी इसकी आवश्यकता हो वह तत्काल डाउनलोड कर इनका उपयोग शुरु कर दे। ऐसा होगा तभी विश्वके सुदूर कोनोंतक बैठे भारतीय इनका लाभ उठा सकेंगे। इस उपलब्धता की जानकारी व लिंक सीडॅकके मुख्य-पृष्ठ पर दी जाय।
साथ ही यह शर्त यदि सीडॅकने लगाई हो तो हटाई जाये कि इन सॉफ्टवेअरको आधार बनाकर किसी प्राइवेट व्यक्ति द्वारा किया गया अगला आविष्कार बेचा नही जा सकता। हमारे देशको संगणकके क्षेत्रमें अगले आविष्कारोंकी नितांत आवश्यकता है जिसके लिये नये प्राइवेट आविष्कारों को प्रोत्साहन देनेपर ही हिंदी का विकास हो सकेगा।
हालाँकि मंगल फॉण्ट फ्री (मुफ्त) उपलब्ध है लेकिन संगणकपर विण्डोज ऑपरेटिंग सिस्टम लोड करते समय इसकी फाईल i-386 बाय-डिफॉल्ट लोड नही होती, उसे अलगसे निर्देश देना पडता है। अतः संगणक-विक्रेताओंपर यह कानूनन जिम्मेवारी डाली जाय की ग्राहक को वे यह फाइल लोड करके और दिखाकर ही बिक्री करेंगे। साथ ही राजभाषा विभाग इस बाबत विज्ञापन बनाकर टीवी पर चलाय़े।
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कुछ बारीकियाँ –
1)
1) दृश्य-निर्देश-तंत्र मूलतः कॅलीग्राफी का काम है जिससे अक्षर की सुंदरता तय होती है।
2) भारत में मायक्रोसॉफ्ट का मार्केट करीब 95 प्रतिशत है और लीनक्स ऑपरेटिंग सिस्टमका केवल 5 प्रतिशत क्योंकि सरकारी संस्थाओंमें मायक्रोसॉफ्टका ही चलन है।
3) यूनीकोडमें संग्रह-तंत्र-मानकके लिये सीडॅकके मानकके साथ-साथ रोमन-फोनेटिकका मानक भी रखा है अतः गूगल-ट्रान्सलिटरेशन या बरहा जैसे सॉफ्टवेअर हिंदी-लेखन के लिये रोमन लिपीमें लिखकर हिंदी लिपीमें पढे जानेवाली सुविधा देते हैं, लेकिन इसमें हिंदी लिपी के धीरे-धीरे लुप्त होने की संभावना बनी रहती है। साथही देशके पचास प्रतिशत बच्चे जो आठवीं कक्षातक आते आते स्कूल छोड देते हैं, उन्हे कभी भी संगणकका उपयोग नही सिखाया जा सकता।

1 comment:

om sapra said...

thanks for sending ur valuable write up abt sangnak par hindi...regards,om sapra, delhi-9
9818180932